मेरे प्रिय कवि लेखक, तुलसीदास

 मेरे प्रिय कवि लेखक, तुलसीदास  : निबंध 



मेरे प्रिय कवि : तुलसीदास नामक निबंध के निबंध लेखन से अन्य संबंधित शीर्षक अर्थात मेरे प्रिय कवि तुलसीदास से मिलता जुलता हुआ ,कोई भी शीर्षक  आपकी परीक्षा में पूछा जा सकता है ।इसी प्रकार से निबंध भी लिखा जाएगा तुलसीदास से मिलते जुलते शीर्षक किस प्रकार है ।

 • गोस्वामी तुलसीदास 

 • लोकनायक तुलसीदास 

 • अपना प्रिय कवि 

 • रामचरितमानस के रचयिता तुलसीदास 

 • अमर कवि तुलसीदास 

मेरे प्रिय कवि : तुलसीदास 

हिंदी साहित्य कोश में अनेक जगमगाते हुए नक्षत्र में से गोस्वामी तुलसीदास जी की चमक सबसे निराली है ।भक्ति काल से इस माहाकवि ने अपनी कालजियो कृतियों में से जो अमर ख्याति प्राप्त की है ,वह बहुत कम ही कवि प्राप्त कर पाते हैं। तुलसीदास जी मेरे प्रिय कवि इसलिए है, क्योंकि उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से जो उपदेश दिए हैं, वे लोग मंगल का विधान करने वाले हैं ।

जीवन परिचय : 

गोस्वामी तुलसीदास का जन्मस्थान विवादित है। अधिकांश विद्वानों व राजकीय साक्ष्यों के अनुसार इनका जन्म  जनपद कासगंज उत्तर प्रदेश  में हुआ था। कुछ लोग इनका जन्म राजापुर जिला चित्रकूट में हुआ मानते हैं। उत्तर प्रदेश  के कासगंज  जनपद के अंतर्गत एक सतयुगीन तीर्थस्थल शूकरक्षेत्र है। वहां पं० सच्चिदानंद शुक्ल नामक एक प्रतिष्ठित सनाढ्य ब्राह्मण रहते थे। उनके दो पुत्र थे, पं० आत्माराम शुक्ल और पं० जीवाराम शुक्ल। पं० आत्माराम शुक्ल एवं हुलसी के पुत्र का नाम महाकवि गोस्वामी तुलसीदास था, जिन्होंने श्रीरामचरितमानस महाग्रंथ की रचना की थी। नंददास जी के छोटे भाई का नाम चँदहास था। नंददास जी, तुलसीदास जी के सगे चचेरे भाई थे। नंददास जी के पुत्र का नाम कृष्णदास था। नंददास ने कई रचनाएँ- रसमंजरी, अनेकार्थमंजरी, भागवत्-दशम स्कंध, श्याम सगाई, गोवर्द्धन लीला, सुदामा चरित, विरहमंजरी, रूप मंजरी, रुक्मिणी मंगल, रासपंचाध्यायी, भँवर गीत, सिद्धांत पंचाध्यायी, नंददास पदावली हैं।

गोस्वामी तुलसीदास (1511 - 1623) हिन्दी साहित्य के महान संत कवि  थे। रामचरितमानस  इनका गौरव ग्रन्थ है। इन्हें आदि काव्य रामायण  के रचयिता महर्षि वाल्मीकि  का अवतार भी माना जाता है।

रामचरितमानस  का कथानक रामायण  से लिया गया है। रामचरितमानस लोक ग्रन्थ है और इसे उत्तर भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके बाद विनय पत्रिका  उनका एक अन्य महत्त्वपूर्ण काव्य है। महाकाव्य श्रीरामचरितमानस को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यों में 46वाँ स्थान दिया गया। तुलसीदास जी स्मार्त वैष्णव थे।

बचपन 

भगवान की प्रेरणा से शूकरक्षेत्र में रहकर पाठशाला चलाने वाले गुरु नृसिंह चौधरी ने इस रामबोला के नाम से बहुचर्चित हो चुके इस बालक को ढूँढ निकाला और विधिवत उसका नाम तुलसीदास रखा। गुरु नृसिंह चौधरी ने ही इन्हें रामायण, पिंगलशास्त्र व गुरु हरिहरानंद ने इन्हें संगीत की शिक्षा दी। तदोपरान्त बदरिया निवासी दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से इनका विवाह हुआ। एक पुत्र भी इन्हें प्राप्त हुआ, जिसका नाम तारापति/तारक था, जोकि कुछ समय बाद ही काल कवलित हो गया। रत्नावली के पीहर (बदरिया) चले जाने पर ये रात में ही गंगा को तैरकर पार करके बदरिया जा पहुंचे। तब रत्नावली ने लज्जित होकर इन्हें धिक्कारा। उन्हीं वचनों को सुनकर इनके मन में वैराग्य के अंकुर फूट गए और 36 वर्ष की अवस्था में शूकरक्षेत्र  को सदा के लिए त्यागकर चले गए ।

रचनाएं 

अपने 126 वर्ष के दीर्घ जीवन-काल में तुलसीदास ने कालक्रमानुसार निम्नलिखित कालजयी ग्रन्थों की रचनाएँ कीं 

 •गीतावली                           •  रामलालनछहू 

 •कृष्ण गीतावली                   •   दोहावली 

 •रामचरितमानस                   •  वैराग्य संदीपनी 

 •पार्वती मंगल                       •  रामाज्ञा प्रश्न 

 •विनय पत्रिका                      •  जानकी मंगल 

 •सतसई बरवै रामायण            • कवितावली 

 •हनुमान बाहुक 

इनमें से रामचरितमानस, विनय-पत्रिका, कवितावली, गीतावली जैसी कृतियों के विषय में किसी कवि की यह आर्षवाणी सटीक प्रतीत होती है - पश्य देवस्य काव्यं, न मृणोति न जीर्यति। अर्थात देवपुरुषों का काव्य देखिये जो न मरता न पुराना होता है।

लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व आधुनिक प्रकाशन-सुविधाओं से रहित उस काल में भी तुलसीदास का काव्य जन-जन तक पहुँच चुका था। यह उनके कवि रूप में लोकप्रिय होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मानस जैसे वृहद् ग्रन्थ को कण्ठस्थ करके सामान्य पढ़े लिखे लोग भी अपनी शुचिता एवं ज्ञान के लिए प्रसिद्ध होने लगे थे।

रामचरितमानस  तुलसीदास जी का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रन्थ रहा है। उन्होंने अपनी रचनाओं के सम्बन्ध में कहीं कोई उल्लेख नहीं किया है, इसलिए प्रामाणिक रचनाओं के सम्बन्ध में अन्त:साक्ष्य का अभाव दिखायी देता है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ इस प्रकार हैं :

  • रामचरितमानस              • रामललानहछू
  • वैराग्य-संदीपनी              •  बरवै रामायण
  • पार्वती-मंगल                  •  जानकी-मंगल
  • रामाज्ञाप्रश्न                     • दोहावली
  • कवितावली                    •  गीतावली 
  • श्रीकृष्ण-गीतावली           •   विनय-पत्रिका
  • सतसई                          •   छंदावली रामायण
  • कुंडलिया रामायण           •  राम शलाका
  • संकट मोचन                   •  करखा रामायण
  • रोला रामायण                  • झूलना
  • छप्पय रामाय                   • कवित्त रामायण
  • कलिधर्माधर्म निरूपण       • हनुमान चालीसा 

महाकाव्य रामचरितमानस 

संवत्‌  1632 का प्रारम्भ हुआ। दैवयोग से उस वर्ष रामनवमी  के दिन वैसा ही योग आया जैसा त्रेता युग  में राम-जन्म के दिन था। उस दिन प्रातःकाल तुलसीदास जी ने रामचरितमानस  की रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में यह अद्भुत ग्रन्थ सम्पन्न हुआ। संवत्‌ 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम-विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।

इसके बाद भगवान की आज्ञा से तुलसीदास जी काशी  चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान विश्वनाथ  और माता अन्नपूर्णा  को रामचरितमानस  सुनाया। रात को पुस्तक विश्वनाथ-मन्दिर में रख दी गयी। प्रात:काल जब मन्दिर के पट खोले गये तो पुस्तक पर लिखा हुआ पाया गया सत्यम शिवम सुंदरम  जिसके नीचे भगवान शंकर  की सही (पुष्टि) थी। उस समय वहाँ उपस्थित लोगों ने सत्यम शिवम सुंदरम " की आवाज भी कानों से सुनी।

इधर काशी के पण्डितों को जब यह बात पता चली तो उनके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। वे दल बनाकर तुलसीदास जी की निन्दा और उस पुस्तक को नष्ट करने का प्रयत्न करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुराने के लिये दो चोर भी भेजे। चोरों ने जाकर देखा कि तुलसीदास जी की कुटी के आसपास दो युवक धनुषबाण लिये पहरा दे रहे हैं। दोनों युवक बड़े ही सुन्दर क्रमश: श्याम और गौर वर्ण के थे। उनके दर्शन करते ही चोरों की बुद्धि शुद्ध हो गयी। उन्होंने उसी समय से चोरी करना छोड़ दिया और भगवान के भजन में लग गये। तुलसीदास जी ने अपने लिये भगवान को कष्ट हुआ जान कुटी का सारा समान लुटा दिया और पुस्तक अपने मित्र टोडरमल (अकबर के नौरत्नों में एक) के यहाँ रखवा दी। इसके बाद उन्होंने अपनी विलक्षण स्मरण शक्ति से एक दूसरी प्रति लिखी। उसी के आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की गयीं और पुस्तक का प्रचार दिनों-दिन बढ़ने लगा।

इधर काशी के पण्डितों ने और कोई उपाय न देख श्री मधुसूदन सरस्वती नाम के महापण्डित को उस पुस्तक को देखकर अपनी सम्मति देने की प्रार्थना की। मधुसूदन सरस्वती जी ने उसे देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और उस पर अपनी ओर से यह टिप्पणी लिख दी-

आनन्दकानने ह्यास्मिंजंगमस्तुलसीतरुः।
कवितामंजरी भाति रामभ्रमरभूषिता॥

इसका हिन्दी में अर्थ इस प्रकार है-"काशी के आनन्द-वन में तुलसीदास साक्षात तुलसी का पौधा है। उसकी काव्य-मंजरी बड़ी ही मनोहर है, जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा सदा मँडराता रहता है।"

पण्डितों को उनकी इस टिप्पणी पर भी संतोष नहीं हुआ। तब पुस्तक की परीक्षा का एक अन्य उपाय सोचा गया। काशी के विश्वनाथ-मन्दिर में भगवान विश्वनाथ  के सामने सबसे ऊपर वेद , उनके नीचे शास्त्र , शास्त्रों के नीचे पुराण  और सबके नीचे रामचरितमानस  रख दिया गया। प्रातःकाल जब मन्दिर खोला गया तो लोगों ने देखा कि श्रीरामचरितमानस वेदों के ऊपर रखा हुआ है। अब तो सभी पण्डित बड़े लज्जित हुए। उन्होंने तुलसीदास जी से क्षमा माँगी और भक्ति-भाव से उनका चरणोदक लिया ।

सामान्य वादी दृष्टिकोण 

तुलसीदास जी ने अपने सामान्य वादी दृष्टिकोण का परिचय भी अपनी रचनाओं में दिया है जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उन्होंने समन्वय की विराट चेष्टा की है ।ज्ञान और भक्ति का समन्वय ,शैव और वैष्णव  का समन्वय ,निर्गुण और सगुण का समन्वय ,राजा और प्रजा का समन्वय करते हुए उन्होंने कहा है :

    सागुनहीं अगुनहीं नाहीं कछु भेदा।                         गवाही मुनी पुराण बुद्ध वेदा।।

इस प्रकार से और वैष्णव का समन्वय करते हुए भी कहते हैं :

             सिव द्रोही मम दास कहावा ।                                 सौ नर मोही नाहीं सपनेहु भावा ।।       

व्यापक  विषय क्षेत्र 

तुलसीदास का विषय क्षेत्र  अत्यंत व्यापक है उन्होंने जीवन के किसी अंग विशेष का चित्रण ना करते हुए उसकी समग्रता का चित्रण किया है वे मर्यादवादी कवि थे अतः उनकी रचना  में मर्यादा और लोकधर्म का निर्वाह बराबर रूप से किया गया है उनकी रचनाओं में धर्म भक्ति साहित्य संस्कृति का समन्वय है 

तुलसीदास जी अत्यंत प्रतिभा संपन्न कवि थे यद्यपि उन्होंने अपनी काव्य रचना का उद्देश्य स्वांन्त सुखाय: माना है तथापि वे लोकमंगल काव्य को ही श्रेष्ठ मानने के पक्ष में है तथा इस काव्य को महान काव्य भी मानते हैं जो गंगा के समान सर्वहितकारी  हो 

   कीरति भनीति भूति भलि सोई ।                            सुरसरि  सम सब कहां हित होई ।।

अद्भुत प्रतिभा के धनी :

तुलसीदास जी साहित्य शास्त्र के पंडित थे ।यही कारण है ,कि रामचरितमानस मैं उच्च कोटि का साहित्य सौंदर्य भी व्याप्त है ।तुलसीदास ने अपने इस ग्रंथ में ज्ञान भक्ति दर्शन वैराग्य ईश्वर जीव इत्यादि का जो विवेचन किया है, वह उनके पंडितों का परिचायक है ।उनका अध्ययन क्षेत्र व्यापक था ।उन्होंने वेद पुराण उपनिषद इत्यादि का अध्ययन किया था ,और इन सभी का सर रामचरितमानस में विद्यमान है ।

तुलसी की अद्भुत प्रतिभा का परिचय इस बात से भी मिलता है कि उन्होंने अपने समय में प्रचलित सभी काव्य शैलियों में काव्य रचना की है । जायसी की दोहा - चौपाई शैली में भी रामचरितमानस की रचना तुलसी जी ने की है । रहीम की बरवै शैली मैं बरवै रामायण लिखी । कबीर की दोहा शैली में दोहावली भी लिखी ।

वे अरबी और ब्रजभाषा दोनों में काव्य रचना का समन्वय रखते थे । रामचरितमानस उन्होंने अवधी भाषा में लिखी । जबकि कवितावली और विनय पत्रिका की रचना उन्होंने ब्रजभाषा में की । वे संस्कृत भाषा के विद्वान थे ।

लोकप्रिय कवि : 

तुलसी जितने अधिक लोकप्रिय विद्वान है,उतने ही जनसाधारण है ।  बड़े-बड़े विद्वान जहां रामचरितमानस  पर प्रवचन देते हैं ,वही जनसाधारण भी रामचरितमानस से अत्यंत प्रभावित लोगों को सैकड़ो चौपाइयां कंठस्थ है ।यदि 20 ग्रंथ की रचना आज से लगभग 1438 वर्ष पहले हुई थी। तथापि यह अब भी प्रसांगिक बना हुआ है ।अपनी महता के कारण यह ग्रंथ मानव धर्म का संदर्भ यश बन गया है । मनुष्य को कैसा आचरण करना चाहिए, मानव धर्म का क्या स्वरूप है ,मानवता के क्या लक्षण है ,इसे जानने के लिए रामचरितमानस का अध्ययन अनिवार्य है ।

तुलसी का यह ग्रंथ आज अपनी पवित्रता के कारण हिंदुओं के पूजा घरों में प्रतिष्ठित है । इसके अखंड पाठ भी कराए जाते हैं ,तथा इसे पढ़कर शांति भी प्राप्त होती है । यह एक कवि की सफलता का मानदंड है ।

तुलसी के राम 

कुछ काल राजापुर रहने के बाद वे पुन: काशी चले गये और वहाँ की जनता को राम-कथा सुनाने लगे। कथा के दौरान उन्हें एक दिन मनुष्य के वेष में एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमान जी का पता बतलाया। हनुमान ‌जी से मिलकर तुलसीदास ने उनसे श्री रघुनाथ जी  का दर्शन कराने की प्रार्थना की। 

हनुमान्‌जी ने कहा- "तुम्हें चित्रकूट  में रघुनाथ जी  दर्शन होंगें।" इस पर तुलसीदास जी चित्रकूट की ओर चल पड़े।

चित्रकूट पहुँच कर उन्होंने रामघाट पर अपना आसन जमाया। एक दिन वे प्रदक्षिणा करने निकले ही थे कि यकायक मार्ग में उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि दो बड़े ही सुन्दर राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर धनुष-बाण लिये जा रहे हैं। तुलसीदास उन्हें देखकर आकर्षित तो हुए, परन्तु उन्हें पहचान न सके। तभी पीछे से हनुमान जी  ने आकर जब उन्हें सारा भेद बताया तो वे पश्चाताप करने लगे। इस पर हनुमान जी ने उन्हें सात्वना दी और कहा प्रातःकाल फिर दर्शन होंगे।

संवत्‌ 1607 की मौनी अमावस्या  को बुधवार के दिन उनके सामने भगवान श्री राम जी पुनः प्रकट हुए। उन्होंने बालक रूप में आकर तुलसीदास से कहा-"बाबा! हमें चन्दन चाहिये क्या आप हमें चन्दन दे सकते हैं?" हनुमान ‌जी ने सोचा, कहीं वे इस बार भी धोखा न खा जायें, इसलिये उन्होंने तोते का रूप धारण करके यह दोहा कहा:

चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।
तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥

तुलसीदास भगवान श्री राम जी की उस अद्भुत छवि को निहार कर अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल गये। अन्ततोगत्वा भगवान ने स्वयं अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान हो गये।

युग चित्रण 

तुलसी ने अपने युग में व्याप्त बुराइयों की ओर इंगित करते हुए। उत्तराकांड में कलयुग की विशेषताएं का निरूपण किया है ।और राम राज्य की परिकल्पना करते हुए आदर्श शासन का प्रारूप तैयार किया है यदि भी कुछ आलोचकों ने तुलसी को ब्राह्मण समर्थक कहकर उनकी निंदा  की है और उनके नारी के संबंधित विचारों को भी वर्तमान युग के अनुरूप नहीं माना यद्यपि उनकी मेहता पर कोई  प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता । निरविवादित रूप में तुलसी जैसे महाकवि के कारण हिंदी साहित्य में भक्ति काल को स्वर्ण युग माना गया है ।

उपसंहार 

तुलसी अद्भुत प्रतिभा संपन्न विश्लेषणात्मक कवि थे । उन्होंने रामचरितमानस के रूप में हिंदी को सर्वोत्तम महान काव्य प्रदान किया है, जिसमें जान-जान को प्रभावित किया है । वे सही अर्थों में भारत के प्रतिनिधि कवि कहे जा सकते हैं ।


          

हम आशा करते हैं, कि इस ब्लॉग पोस्ट से आपको तुलसीदास जी  पर निबंध के विषय में पूर्ण जानकारी प्राप्त हुई होगी। हम चाहते हैं की  इसी प्रकार आपके दोस्त भी तुलसीदास जी  पर निबंध   के विषय में जानकारी प्राप्त करें आप सबसे अनुरोध है ,कृपया कर तुलसीदास जी पर निबंध   के विषय में जानकारी अपने फेसबुक, व्हाट्सएप इत्यादि पर शेयर करें, ताकि अन्य लोग भी इसका लाभ उठा सके ।ऐसे ही हिंदी व्याकरण के विषय में अनेक जानकारी प्राप्त करने के लिए जुड़े रहे Hindi education Blog से ।

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